इस बार फिर हाथ से निकल जाएगा
क्योंकि ऐसा देवतुल्य भिखारी मुझे फिर नहीं मिलेगा।13.
(राजा ने) अपने मन में यह धारणा बना ली
राजा ने अपने मन में यह सामान्य धारणा बना ली, किन्तु प्रत्यक्षतः उसने इसे किसी को नहीं बताया।
नौकर से एक कटोरा पानी मांगकर
उसने ऐसा नीच कार्य करने के लिए औषधि देने वाले से अपना पात्र मांगा।14.
शुक्राचार्य ने मन ही मन यह बात समझ ली
शुक्राचार्य राजा के मन की बात समझ गए, परंतु अज्ञानी राजा इसे समझ नहीं सका।
(शुक्राचार्य) ने मकड़ी के जाले का रूप धारण किया
शुक्राचार्य ने स्वयं को एक छोटी मछली में बदल लिया और भिक्षुक के बर्तन में बैठ गए।15.
राजा ने हाथ में कमंडल ले रखा था।
राजा ने भिक्षुक का पात्र हाथ में ले लिया और ब्राह्मण को क्षमा करने का समय आ गया।
जब राजा ने दान देने के लिए हाथ बढ़ाया,
राजा ने जब दान देने के लिए हाथ में जल लिया तो घड़े से जल नहीं निकला।16.
तोमर छंद
तब महान् ब्राह्मण उठे और बोले:
तब ब्राह्मण क्रोधित हो गया और उसने राजा से कहा कि वह पोर की जांच करें।
(ब्राह्मण ने मन में सोचा कि यदि) टीला को नल में डाल दिया जाए तो
घड़े की नली को तिनके से खोजा गया और इस खोज में शुक्राचार्य की एक आँख चली गई।17.
राजा ने तिलक हाथ में पकड़ लिया
राजा ने तिनके को अपने हाथ में लिया और उसे बर्तन के अन्दर घुमाया।
वह शुक्राचार्य की आँख में घुस गया।
इसने शुक्राचार्य की आंख को छेद दिया और इस प्रकार गुरु शुक्राचार्य की एक आंख खो गई।18.
(शुक्र की) आँख से निकला पानी,