वहां आये सभी कौरव अपने-अपने घर चले गये।
इधर कौरव भी अपने घर चले गये और कृष्ण पुनः द्वारका लौट आये।
दोहरा
(कवि) श्याम कहते हैं, बसदेव वहाँ यज्ञ करके चले गए हैं
जाने से पहले कृष्ण ने एक यज्ञ किया, क्योंकि वसुदेव का पुत्र चौदह लोकों में देवताओं का देवता है।2428.
चौपाई
श्री कृष्ण बढ़े हुए प्रेम से चले गये।
कृष्ण खुशी-खुशी चले गए और घर पहुंचकर उन्होंने अपने पिता के चरणों की पूजा की।
जब पिता ने उन्हें आते देखा,
जब उसके पिता ने उसे आते देखा तो उन्होंने उसे तीनों लोकों का रचयिता समझ लिया।
कृष्ण की खूब प्रशंसा की।
उन्होंने विभिन्न तरीकों से कृष्ण की स्तुति की और अपने मन में कृष्ण की छवि स्थापित की
अपने प्रभु को जानकर उपासना की।
उसने उन्हें अपना प्रभु-ईश्वर मानकर उनकी पूजा की और कृष्ण ने भी उनके मन में सारा रहस्य समझ लिया।
बछित्तर नाटक में कृष्णावतार (दशम स्कन्ध पुराण पर आधारित) वर्णन का अंत में "यज्ञ सम्पन्न कर द्वारका लौटना तथा गोपियों को ज्ञान का उपदेश देना" नामक अध्याय का अंत।
अब देवकी के छहों पुत्रों को लाने का वर्णन शुरू होता है।
स्वय्या
कवि श्याम कहते हैं, तब देवकी चलकर श्रीकृष्ण के पास आईं।
कवि श्याम कहते हैं कि तब देवकी कृष्ण के पास आईं और उन्हें मन ही मन सच्चा भगवान मान लिया, सभी चौदह लोकों के निर्माता के रूप में,
मधु और कैटभ का वध करनेवाली वह स्त्री मन ही मन कृष्ण की इस प्रकार स्तुति कर रही थी।
वह बोली, "हे प्रभु! हमारे सभी पुत्रों को मेरे पास लाओ, जिन्हें कंस ने मार डाला है।"2431.
अपनी माता की वाणी सुनकर भगवान (कृष्ण) उसके सभी पुत्रों को पाताल से ले आये।
देवकी ने भी उन्हें अपना पुत्र समझकर गले लगा लिया।
उनमें अपने जन्म के प्रति चेतना जागृत हुई तथा उन्हें अपने उच्च वंश का भी ज्ञान हुआ।