जिसने एक प्रभु को नहीं पहचाना, उसके लिए चौबीस निष्फल हैं।
जिन्होंने एक को पहचान लिया,
जो एक की उपस्थिति को अनुभव करता है और उसे पहचानता है, वह चौबीसों का सुख अनुभव कर सकता है।
विचित्र पद छंद
(जिन्होंने) एक बात मन में लायी है
और द्वैत का अर्थ नहीं पहचाना है,
(उन्होंने) युग ('दौर') में घंटियाँ बजाई हैं।
ऋषि ने अपने मन को एक प्रभु में लीन कर दिया तथा अन्य किसी विचार को अपने मन में आने नहीं दिया, तब देवताओं ने नगाड़े बजाते हुए पुष्पों की वर्षा की।482.
सभी जटाधारी (योगी) आनंद ले रहे हैं
ऋषिगण प्रसन्न होकर ताली बजाने लगे और गाने लगे।
जहाँ फूल (ख़ुशी से) घूमते हैं
वे अपनी घरेलू चिन्ताएं भूलकर खुशी-खुशी इधर-उधर घूमने लगे।483.
तारक छंद
जब उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या की
इस प्रकार जब ऋषियों ने अनेक वर्षों तक तपस्या की और अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार सब कुछ किया
तब नाथ ने युक्ति बताई और चले गए
महर्षि ने उन्हें अनेक विधियाँ बतायीं और इस प्रकार उन्हें दसों दिशाओं का ज्ञान प्राप्त हो गया।
तब (उसने) ब्राह्मण भगवान (दत्त) ने चौबीस गुरु बनाए
इस प्रकार चौबीस गुरु धारण करके वे ऋषि अन्य ऋषियों के साथ सुमेरु पर्वत पर चले गये।
जब उन्होंने वहाँ कठोर तपस्या की,
वहाँ उन्होंने घोर तपस्या की और फिर गुरुदत्त ने उन सभी को ये निर्देश दिये।485.
टोटक छंद
ऋषि (दत्त) सभी शिष्यों के साथ सुमेर पर्वत पर गए।
सिर पर जटाएं और शरीर पर गेरूआ वस्त्र धारण किए हुए वे मुनि अपने शिष्यों के साथ सुमेरु पर्वत पर गए।
कई वर्षों तक उन्होंने वहां कठोर तपस्या की
वहाँ उन्होंने अनेक वर्षों तक नाना प्रकार की तपस्या की और भगवान् को एक क्षण के लिए भी नहीं भुलाया।486.
दस लाख बीस हजार वर्षों तक ऋषिगण
वहाँ ऋषियों ने दस लाख बीस हजार वर्षों तक नाना प्रकार से तपस्या की।
उन्होंने अपनी राय सभी देशों में लागू की।
फिर उन्होंने उस महान ऋषि के गुप्त सिद्धांतों का प्रचार दूर-दूर के सभी देशों में किया।487.
जब ऋषि का शासन समाप्त हो गया,
जब उस महामुनि का अन्तिम समय आया, तब महामुनि को योगबल से इसका ज्ञान हो गया॥
मुनि योगी ('जति') संसार को धुएं का घर मानते थे।
तब जटाधारी उस मुनि ने इस संसार को धूम्र के बादल के समान समझकर अन्य कार्य की योजना बनायी ।।४८८।।
ऋषि ने योगबल से साध प्राप्त की
योगबल से वायु को नियंत्रित कर शरीर त्यागकर पृथ्वी से चले गये।
दशम द्वार की सुन्दर कपाल कली तोड़कर
कपाल को तोड़कर उसकी आत्मा की ज्योति भगवान् की परम ज्योति में विलीन हो गई।489।
काल के हाथ में सुन्दर ('काल') भयंकर तलवार चमक रही है।
काल (मृत्यु) सभी प्रकार के प्राणियों पर अपनी भयंकर तलवार चलाता रहता है।
समय ने दुनिया में एक बहुत बड़ा जाल बना दिया है
इसने इस संसार का विशाल जाल रच दिया है, जिससे कोई भी नहीं निकल सका।
स्वय्या
(जिन्होंने) विदेशी राजाओं पर विजय प्राप्त की और महान सेनापतियों ('अनीस') और राजाओं ('अवनेस') को मार डाला।
इस काल (मृत्यु) ने समस्त देशों और पृथ्वी के महान राजाओं को मार डाला है, जिनके पास आठ शक्तियां, नौ निधियां, सभी प्रकार की सिद्धियां थीं।
चंद्रमुखी महिलाएं और असीमित धन
वे सभी भगवान् का नाम स्मरण किये बिना नंगे पैर ही यम के वश में होकर इस संसार से चले गये।491.
रावण और मेहरवान भी उसके आगे लाचार थे