वह धर्म से रहित, मोह से रहित, लज्जा से रहित तथा सम्बन्ध से रहित है।
वह बिना कवच, बिना ढाल, बिना पद और बिना वाणी के है।
वह शत्रु रहित है, मित्र रहित है, तथा पुत्र रहित है।
उस आदि सत्ता को नमस्कार उस आदि सत्ता को नमस्कार ।१५.१०५।
कहीं काली मधुमक्खी के रूप में तुम कमल की सुगंध के मोह में लीन हो!
कहीं-कहीं तो आप राजा और गरीब के लक्षण बता रहे हैं!
कहीं न कहीं तुम देश के विभिन्न रूपों के सद्गुणों के निवास हो!
कहीं-कहीं तो तुम राजसी भाव से तामस गुण को प्रकट कर रहे हो! 16. 106