वहाँ उसने एक टॉम कैट को देखा, जिसे वह ध्यानपूर्वक देखता रहा।185.
चूहे को पकड़ने के लिए (जिस पर वह) ध्यान केंद्रित करता है,
चूहों के लिए उनकी तपस्या देखकर बड़े-बड़े तपस्वी भी लज्जित हो गए।
यदि ऐसा ध्यान हरि की प्राप्ति पर लगाया जाए,
यदि भगवान् के लिए ऐसी ध्यान-साधना की जाए, तभी उस अव्यक्त ब्रह्म का साक्षात्कार हो सकता है।186.
हम उन्हें अपना पांचवां गुरु मानते हैं।
मैं उन्हें अपना पांचवां गुरु मानूंगा, ऐसा विचार ऋषियों के राजा दत्त के मन में आया
जो ध्यान देगा,
जो इस प्रकार ध्यान करेगा, वह अवश्य ही भगवान् को प्राप्त कर लेगा।187.
टॉम कैट को पांचवें गुरु के रूप में अपनाने का वर्णन समाप्त।
अब कॉटन कार्डर का गुरु के रूप में वर्णन शुरू होता है
चौपाई
संन्यासराज (दत्ता) आगे चल दिये
अन्य सभी इच्छाओं को त्यागकर तथा मन में केवल एक ही विचार रखकर योगियों के राजा दत्त आगे बढ़े।
तभी (उसने) एक 'कमरे' (पेन्जा) को दुबका हुआ देखा (जो सेना के उसके पास से गुजरने पर भी अपने काम से अपना ध्यान नहीं हटाता था)।
वहाँ उसने एक गत्ते वाले को कपास की गत्तेबाजी करते देखा और मन ही मन यह कहा188
(कि इस पेंगे ने) राजा की सेना को जाते हुए भी नहीं देखा,
"इस आदमी ने अपने सामने से गुज़रती पूरी सेना को नहीं देखा और इसकी गर्दन झुकी रही
सारी सेना उस रास्ते से गुजरी,
सारी सेना इसी रास्ते पर चली गई, परन्तु उसे इसका भान ही नहीं था।”189.
मैंने रोते हुए पीछे मुड़कर नहीं देखा,
रुई छानते समय उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और इस नीच व्यक्ति ने अपनी गर्दन झुका रखी थी
यह देखकर दत्त मन ही मन मुस्कुराये।
उन्हें देखकर दत्त मन ही मन मुस्कुराये और बोले, "मैं इन्हें अपना छठा गुरु स्वीकार करता हूँ।"190.
जैसा कि इसे रूण (पिंजन) के लिए लगाया गया है।
और सेना गुजर गयी, परन्तु उसने सिर न उठाया।
ऐसा प्रेम प्रभु से होना चाहिए,
जिस प्रकार उसने अपना मन रूई में लगा लिया और सेना चली गई और उसने सिर नहीं उठाया, उसी प्रकार जब प्रभु से प्रेम हो जाएगा, तब वह पुरातन पुरुष अर्थात् प्रभु का साक्षात्कार हो जाएगा।।191।।
कार्डर को छठे गुरु के रूप में अपनाने का वर्णन समाप्त।
अब मछुआरे का सातवें गुरु के रूप में वर्णन शुरू होता है
चौपी
संन्यासराज (दत्ता) आगे चल दिये
वे शुद्धचित्त वाले महान तपस्वी दत्त आगे बढ़े।
उसने एक मच्छी (मछली पकड़ने वाला) को देखा।
वहाँ उसने एक मछुआरे को जाल लेकर जाते देखा।192.
वह अपने हाथ में एक हुकदार छड़ी ('बिंछी') पकड़े हुए था।
वह एक हाथ में भाला पकड़े हुए था और एक कंधे पर जाल लिये हुए था।
और अंधे की तरह चला, मछली की आशा में लगा रहा।
वह मछली के लिए इस प्रकार खड़ा था मानो उसका शरीर श्वासहीन हो गया हो।193.
वह एक मछली का इंतज़ार कर रहा था,
वह एक मछली पकड़ने की इच्छा से इस प्रकार खड़ा था मानो कोई अपने सारे साज-सामान से विरक्त होकर धैर्य के साथ खड़ा हो।
आओ हम प्रभु से इस तरह प्रेम करें,
दत्त ने सोचा कि यदि भगवान के लिए ऐसा प्रेम किया जाए तो वह पूर्ण पुरुष अर्थात् भगवान् भी भगवान् के लिए प्रेम कर सकते हैं।
मछुआरे को सातवें गुरु के रूप में अपनाने का वर्णन समाप्त।
अब दासी को आठवें गुरु के रूप में अपनाने का वर्णन शुरू होता है
चौपाई
दक्ष प्रजापति (मुनि (दत्त) का घर)।
जब दत्त ऋषि अपनी सेना सहित दक्ष प्रजापति के निवास पर पहुंचे तो वे बहुत प्रसन्न हुए।