हे कृष्ण! मैं भी चन्द्रमा हूँ, रात्रि का स्वामी! अब युद्ध टालो मत।
प्रसन्नता के साथ आओ, ताकि हम युद्ध का खेल खेल सकें और जीत सकें।”1917.
उसकी बातें सुनकर कृष्ण उसकी ओर बढ़े और
क्रोध में उसने अपनी बन्दूक उसकी ओर तान दी
उसने पहले उसके सारथी को गिरा दिया और फिर उसके चारों घोड़ों को मार डाला
कृष्ण ने उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये सभी प्रकार के हथियारों को रोक दिया।1918.
चौपाई
(काल जामन) मालेच क्रोधित हो गया और उसने जो भी कवच था, उसे उठा लिया,
जिस मलेच्छ ने अपना हथियार उठाया था, उसे कृष्ण ने काट डाला
जब दुश्मन ने कदम रखा पैदल,
जब शत्रु केवल पैदल ही रह गया और उसका रथ छीन लिया गया, तब कृष्ण ने कहा, "क्या तुम ऐसे बल पर भरोसा करके मुझसे युद्ध करने आये हो?"
स्वय्या
श्रीकृष्ण ने मन में सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि मलेच्छ मुकाय से युद्ध करने लगे।
कृष्ण ने मन में सोचा कि यदि यह मलेच्छ मुष्टिक मुझसे युद्ध करेगा तो मेरे पूरे शरीर को अपवित्र कर देगा
(वह) सम्पूर्ण शरीर में कवच और कवच से सुशोभित है। सम्पूर्ण सेना के साथ भी मैं उसे नहीं मार सकूँगा।
यदि वह अपने कवच और शस्त्रों से सुसज्जित होकर आये, तब भी मैं उसे नहीं मार पाऊँगा और यदि मैं उसे शस्त्रहीन अवस्था में मार दूँ, तो उसका बल क्षीण हो जायेगा।।1920।।
कृष्ण ने मन में सोचा कि यदि वह भागेंगे तो मलेच्छ भी उनके पीछे भागेंगे।
वह किसी गुफा में प्रवेश तो कर लेता, लेकिन वह नहीं चाहता कि मलेच्छ उसके शरीर को छूए
वह सोये हुए मुचुकुंद (मान्धाता के पुत्र, जिन्हें वरदान प्राप्त था कि जो कोई भी उन्हें नींद से जगाएगा, वह भस्म हो जाएगा) को जगा देगा।
वह स्वयं तो छिप जाता, किन्तु मुचुकुन्द की दृष्टि की अग्नि से उस मलेच्छ को मरवा डालता।
सोर्था
यदि वह युद्ध करते समय उसे (काल्यवन को) मार देगा तो वह स्वर्ग जाएगा, इसलिए वह उसे अग्नि में भस्म करवा देगा,
ताकि उसका मलेच्छ धर्म (विशेषता) अक्षुण्ण रहे।1922.
स्वय्या
कृष्ण अपना रथ और हथियार छोड़कर सभी को भयभीत करते हुए भाग गए।
कल्यवन ने सोचा कि वह उससे डरकर भाग गया है, इसलिए उसने कृष्ण का पीछा किया और उन्हें पुकारा
कृष्ण वहाँ पहुँचे जहाँ मुचुकुन्द सो रहे थे और
उसने उसे लात मारकर जगाया और फिर स्वयं को छिपा लिया, इस प्रकार कृष्ण ने स्वयं को तो बचा लिया, किन्तु काल्यवन को भस्म कर दिया।1923.
सोर्था
कृष्ण ने मुचुकुंद से स्वयं को बचा लिया, लेकिन जब मुचुकुंद नींद से जागे और
1924. कल्यवन की ओर देखते ही देखते वह भस्म हो गया।
स्वय्या
जब काल्यवन जलकर राख हो गया, तब कृष्ण मुचुकुंद के पास आये।
श्रीकृष्ण को देखते ही मुचुकुंद ने उनके चरणों में सिर झुका दिया।
भगवान कृष्ण ने अपने शब्दों से उन्हें सांत्वना दी और मुचुकुंद को निर्देश दिया
काल्यवन को भस्म करके वे अपने घर चले गये।1925.
बछित्तर नाटक में कृष्णावतार में "काल्यवन वध" नामक अध्याय का अंत।
स्वय्या
जैसे ही कृष्ण अपने तम्बू में पहुंचे, कोई संदेश देने आया,
"हे कृष्ण! तुम अपने घर क्यों जा रहे हो? उस ओर जरासंध अपनी सेना के साथ सज-धज कर आ रहा है।"
ये शब्द सुनकर योद्धाओं के मन भयभीत हो गए।
परन्तु कृष्ण और बलराम इससे प्रसन्न हुए।
दोहरा
इस चर्चा में मग्न होकर सभी योद्धा नगर में पहुंचे।
राजा उगगरसैन ने तब अपने बुद्धिमान विश्वासपात्रों को बुलाया।1927.
स्वय्या
राजा ने कहा, जरासंध अपनी विशाल सेना के साथ क्रोध में आ रहा है और
हम लड़ाई करके खुद को नहीं बचा सकते