स्वय्या
माघ मास के बाद फागुन ऋतु में सभी होली खेलने लगे
सभी लोग जोड़े में इकट्ठे हुए और संगीत वाद्ययंत्र बजाते हुए गीत गाए
महिलाओं पर तरह-तरह के रंग डाले गए और महिलाओं ने पुरुषों को लाठियों से (स्नेहपूर्वक) पीटा।
कवि श्याम कहते हैं कि कृष्ण और सुन्दरी युवतियां मिलकर यह उत्पातपूर्ण होली खेल रही हैं।
जब बसंत ऋतु समाप्त हो गई और ग्रीष्म ऋतु शुरू हो गई, तो कृष्ण ने धूमधाम से होली खेलना शुरू कर दिया
दोनों पक्षों से लोग उमड़ पड़े और कृष्ण को अपना नेता देखकर प्रसन्न हुए
इस सारे कोलाहल में प्रलम्ब नामक राक्षस युवक का रूप धारण करके आया और अन्य युवकों के साथ मिल गया।
वह कृष्ण को अपने कंधे पर उठाकर उड़ गया और कृष्ण ने अपनी मुट्ठियों से उस राक्षस को गिरा दिया।
कृष्ण नेता बन गए और सुंदर लड़कों के साथ खेलने लगे
राक्षस कृष्ण का नाटक भी बन गया और उस नाटक में बलराम की जीत हुई और कृष्ण की हार हुई
तब कृष्ण ने हलधर से उस राक्षस के शरीर पर चढ़ने को कहा।
बलरामजी ने उसके शरीर पर पैर रखकर उसे गिरा दिया और मुट्ठियों से उसे मार डाला।227.
बछित्तर नाटक में कृष्णावतार में राक्षस पलाम्ब के वध का अंत।
अब शुरू होता है लुका-छिपी खेल का वर्णन
स्वय्या
हलधर ने राक्षस प्रलंब को मार डाला और कृष्ण को बुलाया
तब कृष्ण ने गायों और बछड़ों के मुख चूमे
प्रसन्न होकर दया के भण्डार (कृष्ण) ने 'छिपाओ और बीज डालो' का खेल शुरू किया।
इस दृश्य का वर्णन कवि ने अनेक प्रकार से किया है।228.
कबित
एक गोप बालक ने दूसरे बालक की आंखें बंद कर दीं और उसे छोड़कर उसने दूसरे की आंखें बंद कर दीं।
फिर वह लड़का उस लड़के की आंखें बंद कर देता है जो आंखें बंद कर रहा था और जिसके शरीर को हाथों से छुआ गया था
फिर धोखे से हाथ से न छूने की कोशिश करता है