कहीं भूत-प्रेत और प्रेत नाचा करते थे। ६१।
कहीं-कहीं तो दैत्य बड़े-बड़े दाँत दिखाते थे।
कितने ही लोग युद्ध के मैदान में मारे गये (और उनके घावों से खून बह रहा था)।
कहीं मुकुट पड़े थे तो कहीं कवच और गोले ऐसे पड़े थे,
जैसे शीत ऋतु में दर्जी ने बहुत से कपड़े बुने और छोड़ दिये हैं। 62.
वहाँ घोड़ों और हाथियों के रक्त की धाराएँ बह रही थीं।
जैसे फव्वारे बहते हैं।
(ऐसा लग रहा था) जैसे दूसरी जल प्रलय आ गई हो
और जिसमें करोड़ों वीरों के वीर मारे गए हैं। ६३।
वहां करोड़ों हाथियों के दांत काटे गए।
कहीं मारे गए योद्धा पड़े थे (और कहीं फटे हुए झंडे गिरे हुए थे)।
कहीं-कहीं युवा घुड़सवार युद्ध में घोड़े नाच रहे थे।
कहीं मृत्युघण्टा बज रही थी और भारी शोर उठ रहा था। 64.
कहीं-कहीं मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि आ रही थी
और कहीं राजा (योद्धा) हंस रहा था और ताली बजा रहा था।
(कहीं-कहीं) बड़ी-बड़ी घंटियाँ, तुरही, झांझ बज रहे थे।
कहीं-कहीं छाताधारी क्रोध से भरे खड़े थे। 65.
कहीं-कहीं बड़े-बड़े ढोलों से घातक राग बज रहा था।
कहीं-कहीं तुरही, नगाड़े और ढोल बज रहे थे।
कहीं-कहीं सेम-सेम सुन्दर खेल रहे थे।
कहीं रुचांग, मृदंग, उपांग और मुचांग बज रहे थे। ६६.
खिड़की के नीचे ऐसी लड़ाई हुई,
जिसकी समानता देवताओं और दानवों में भी नहीं थी।
राम और रावण के बीच ऐसा कोई युद्ध नहीं हुआ था
और न ही महाभारत में ऐसा कुछ किया गया था।
वहाँ बहुत से योद्धा खड़े होकर चिल्ला रहे थे।
कुछ लोग तीर चला रहे थे और कुछ कवच पहने हुए थे।
कहीं-कहीं महिलाओं के वेश में
जिद्दी योद्धा अपने घोड़ों से भाग रहे थे। 68.
कितने पठानों को भगा दिया गया और कितने युद्ध-क्षेत्र में मारे गये।
युद्ध के मैदान में घोड़ों ने कितने ही छत्रों को रौंद दिया।
जहाँ जिद्दी योद्धा मारे गए,
सिद्ध पाल (आप) घेरा बनाकर वहां आये। 69.
जब सिद्धपाल को पठानों ने देखा,
इसलिए कोई भी हाथ में हथियार नहीं रख सकता था।
कितने भाग गये और कितने युद्ध भूमि में मारे गये।
(ऐसा लग रहा था) मानो हवा ने पल्लास के पुराने पंख उड़ा दिए हों। 70.
युद्ध में जितने भी जिद्दी योद्धा शामिल थे, सभी युद्ध के मैदान में मारे गए
और कितनों को बाहर निकाल कर किले में फेंक दिया गया।
कुछ को बाँध दिया गया और कुछ को छोड़ दिया गया।
कितने लोगों की जान गई और कितने बचाए गए। 71.
जिसने तलवार उठाई वह मारा गया।
केवल वही बच गया जो भाग गया।
जहां तक मैं जानता हूं, वहां बहुत भीषण युद्ध हुआ था।
लोहा खड़खड़ाता देख छत्रधारी को क्रोध आया। 72।
कहीं नाद (नरसिंघे) बज रहा है तो कहीं नाद (शंख) पूरा हो रहा है।
कुछ युवक लड़ते हुए मारे गए थे और (हूर) योद्धाओं को देखकर रो रहे थे।
कहीं-कहीं (योद्धा) आकर कृपाण चलाते हैं।