विष्णुपाद काफी
चारों तरफ घातक शब्दों का खेल शुरू हो गया है।
चारों दिशाओं में गरजते हुए नरसिंगे बजने लगे और योद्धा अपनी-अपनी गदाएं थामे युद्ध भूमि में दृढ़तापूर्वक खड़े रहे।
तीर, धनुष, तलवार, भाले आदि का प्रयोग किया गया
बाणों के समूह बादलों से बरसती हुई वर्षा की बूंदों की तरह बरस रहे थे
कवच और चमड़े को भेदते हुए तीर सीधे दूसरी ओर जा घुसे
और पृथ्वी को भेदकर पाताल लोक में भी चला गया
योद्धा तलवारें खींचते हैं और उन्हें विभिन्न तरीकों से चलाते हैं।
योद्धाओं ने चमकते हुए खंजरों और भालों पर प्रहार किया और वे हथियार ऐसे प्रतीत हुए जैसे हृदयों को छेद रहे हों और उन्हें स्वर्ग का मार्ग दिखा रहे हों।।35.109।।
विष्णुपाद सोरठ
अनगिनत तपस्वियों को बाणों से घायल किया गया है।
असंख्य संन्यासी बाणों से घायल हो गए और वे सभी धन-सम्पत्ति का मोह त्यागकर स्वर्गवासी हो गए।
कवच, पताकाएं, रथ और ध्वज आदि काट कर गिरा दिए गए
वे सभी स्वर्ग की महिमा और इंद्र और यम के निवास का विस्तार करते थे
उनके बहुरंगी वस्त्र ज़मीन पर गिर पड़े
वे अशोक वाटिका में वसंत ऋतु में गिरते फूलों की तरह लग रहे थे
हाथियों के सिरों (ऊपर सुशोभित) पर मोती बिखरे हुए हैं।
हाथियों की सूंडें और मोतियों के हार पृथ्वी पर बिखरे पड़े थे और अमृत के कुण्ड से बिखरी हुई जल की बूंदों के समान प्रतीत हो रहे थे। 36.110।
देवगांधारी
दूसरे की तरह
दोनों ओर से अभिमानी योद्धा एक दूसरे पर आक्रमण कर रहे हैं।
दोनों दिशाओं से योद्धा गिर पड़े और तलवारें निकालकर “मारो, मारो” चिल्लाते हुए आगे बढ़े।
क्रोध से भरे हुए तपस्वी युद्धभूमि में रौंदते हैं।
वे क्रोधित योद्धा अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथ में लेकर इधर-उधर भटकने लगे और हाथी-सरदारों तथा सारथिओं को मारते हुए अन्त में पृथ्वी पर गिर पड़े॥
तीरों को तार में पिरोकर कानों पर बाँधा जा रहा है।
उन्होंने धनुष को कानों तक खींचकर बाण छोड़े और इस प्रकार अपने शस्त्रों से प्रहार करते हुए क्षत्रिय धर्म का पालन किया।
(योद्धाओं के) अंग बाणों से छेदे जा रहे हैं और इस प्रकार युवक युद्ध कर रहे हैं।
बाणों से बिंधे हुए योद्धा उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे अर्जुन के समय भीष्म बाणों की शय्या पर गिर पड़े थे।
विष्णुपाद सारंग
इस प्रकार अनेक संन्यासी मारे गये।
कई लोग बंधे हुए डूब गए और कई लोग आग में जल गए
कई ऐसे थे जिनके एक हाथ कटे थे और कई ऐसे भी थे जिनके दोनों हाथ कटे थे
अनेक सारथी टुकड़े-टुकड़े हो गए तथा अनेकों के सिर काट दिए गए
युद्ध भूमि में अनेकों के छत्र, चप्पू, रथ, घोड़े आदि कट गए
बहुतों के मुकुट लाठी से तोड़ दिए गए और बहुतों के जटाओं की गांठें उखाड़ दी गईं
बहुत से लोग घायल होकर धरती पर गिर पड़े और उनके अंग क्षत-विक्षत हो गए।
रक्त ऐसे बह रहा था मानो सभी लोग बसंत ऋतु में होली खेल रहे हों।
विष्णुपाद आदन
कटे हुए केस अच्छे और चिकने होते हैं।
चारों दिशाओं से स्वर्ग की देवियाँ अपने केशों को सजाकर युद्धभूमि में एकत्रित हुईं।
उनके गाल सुन्दर थे, आँखों में सुरमा था और नाक में छल्ले थे
वे चोरों की तरह सबके दिल चुरा रहे थे,
और आपस में अंगों पर केसर लगाने के विषय में बातचीत कर रहे थे,
क्योंकि उस दिन सुन्दर राजकुमारी का विवाह होना था
वे उत्साहपूर्वक उस युद्ध से योद्धाओं का चयन कर रहे हैं।
युद्धस्थल में जो योद्धा तलवार, बाण, धनुष, शस्त्र आदि से पराजित हो रहे थे, उन योद्धाओं को वे उत्साही देवकन्याएँ उठाकर उनसे विवाह कर रही थीं।।३९.११३।।
विष्णुपाद सोरठ
जब तक मैं उपमा ख़त्म नहीं कर लेता।