हे प्रभु! जब मैं सुनता हूँ कि आप उन लोगों के प्रिय हैं जो सदैव आपकी पूजा करते हैं, तो मैं जो आपकी पूजा से वंचित हूँ, दुखी और निराश हो जाता हूँ। लेकिन जब मैं सुनता हूँ कि आप पापियों को क्षमा करते हैं और उन्हें धर्मपरायण बनाते हैं, तो मेरे हृदय में आशा की किरण जग जाती है।
मैं दुष्ट जब सुनता हूँ कि आप सबके भावों और विचारों को जानने वाले हैं, तो मेरे भीतर काँप उठता है। किन्तु जब मैं सुनता हूँ कि आप दीन-दुखियों पर दया करते हैं, तो मेरे सारे भय दूर हो जाते हैं।
जिस प्रकार रेशमी कपास का वृक्ष (बॉम्बेक्स हेप्टाफाइलम) बहुत फैला हुआ और ऊँचा होता है, वर्षा ऋतु में भी उसमें फूल या फल नहीं लगते, परन्तु चन्दन के वृक्ष के समीप लाने पर वह भी उतना ही सुगंधित हो जाता है। उसी प्रकार अहंकारी व्यक्ति भी उसके सम्पर्क में आकर सुगंधित हो जाता है।
मेरे बुरे कर्मों के कारण मुझे नरक में भी स्थान नहीं मिल सकता। परन्तु मैं आपके दयालु, परोपकारी, क्षमाशील और दुष्टों को सुधारने वाले स्वरूप पर ही निर्भर हूँ। (503)