जलने, पानी में डूबने, सर्पदंश या हथियार के प्रहार से प्राप्त घावों के कारण शरीर में दर्द;
अनेक कष्टों को झेलना, गर्मी, सर्दी और वर्षा ऋतु में भी दिन गुजारना और इन असुविधाओं को सहन करना;
गौ, ब्राह्मण, स्त्री, न्यास, कुटुम्ब आदि की हत्या तथा कामनाओं के वशीभूत होकर किये गये ऐसे अनेक पापों और कलंकों के कारण शरीर को होने वाले कष्ट।
संसार के सारे दुःख मिलकर भी भगवान के वियोग की पीड़ा के बराबर नहीं पहुँच पाते। (भगवान के वियोग की पीड़ा के आगे संसार के सारे दुःख तुच्छ हैं।) (572)