जिस विधाता ने शेषनाग के एक हजार फनों के अग्रभाग पर अत्यन्त भारी पृथ्वी को रख दिया है, यदि हम उसे पर्वत उठाने के कारण गिरधर कहें, तो उसकी क्या प्रशंसा है?
भगवान् जो स्वयं को विश्वनाथ कहते हैं, उनके द्वारा रचित कामातुर शिव को यदि हम ब्रजभूमि का स्वामी कहें, तो उनकी कौन सी स्तुति है? (उनकी रचना की सीमा असीम है)।
जिस भगवान ने असंख्य रूप उत्पन्न किये हैं, उन्हें नन्द का पुत्र कहना उनके लिए कोई प्रशंसा की बात नहीं है।
अज्ञानी और मूर्ख भक्त इसे भगवान की स्तुति कहते हैं। वस्तुतः वे भगवान की निन्दा कर रहे हैं। ऐसी स्तुति कहने से तो चुप रहना ही अच्छा है। (556)