कबित सव्ये भाई गुरदास जी

पृष्ठ - 556


ਜਾ ਕੇ ਅਨਿਕ ਫਨੰਗ ਫਨਗ੍ਰ ਭਾਰ ਧਰਨਿ ਧਾਰੀ ਤਾਹਿ ਗਿਰਧਰ ਕਹੈ ਕਉਨ ਸੀ ਬਡਾਈ ਹੈ ।
जा के अनिक फनंग फनग्र भार धरनि धारी ताहि गिरधर कहै कउन सी बडाई है ।

जिस विधाता ने शेषनाग के एक हजार फनों के अग्रभाग पर अत्यन्त भारी पृथ्वी को रख दिया है, यदि हम उसे पर्वत उठाने के कारण गिरधर कहें, तो उसकी क्या प्रशंसा है?

ਜਾ ਕੋ ਏਕ ਬਾਵਰੋ ਬਿਸ੍ਵਨਾਥ ਨਾਮ ਕਹਾਵੈ ਤਾਹਿ ਬ੍ਰਿਜਨਾਥ ਕਹੇ ਕਉਨ ਅਧਿਕਾਈ ਹੈ ।
जा को एक बावरो बिस्वनाथ नाम कहावै ताहि ब्रिजनाथ कहे कउन अधिकाई है ।

भगवान् जो स्वयं को विश्वनाथ कहते हैं, उनके द्वारा रचित कामातुर शिव को यदि हम ब्रजभूमि का स्वामी कहें, तो उनकी कौन सी स्तुति है? (उनकी रचना की सीमा असीम है)।

ਅਨਿਕ ਅਕਾਰ ਓਅੰਕਾਰ ਕੇ ਬਿਥਾਰੇ ਜਾਹਿ ਤਾਹਿ ਨੰਦ ਨੰਦਨ ਕਹੇ ਕਉਨ ਸੋਭਤਾਈ ਹੈ ।
अनिक अकार ओअंकार के बिथारे जाहि ताहि नंद नंदन कहे कउन सोभताई है ।

जिस भगवान ने असंख्य रूप उत्पन्न किये हैं, उन्हें नन्द का पुत्र कहना उनके लिए कोई प्रशंसा की बात नहीं है।

ਜਾਨਤ ਉਸਤਤਿ ਕਰਤ ਨਿੰਦਿਆ ਅੰਧ ਮੂੜ ਐਸੇ ਅਰਾਧਬੇ ਤੇ ਮੋਨਿ ਸੁਖਦਾਈ ਹੈ ।੫੫੬।
जानत उसतति करत निंदिआ अंध मूड़ ऐसे अराधबे ते मोनि सुखदाई है ।५५६।

अज्ञानी और मूर्ख भक्त इसे भगवान की स्तुति कहते हैं। वस्तुतः वे भगवान की निन्दा कर रहे हैं। ऐसी स्तुति कहने से तो चुप रहना ही अच्छा है। (556)