कबित सव्ये भाई गुरदास जी

पृष्ठ - 589


ਜੈਸੇ ਅਲ ਕਮਲ ਕਮਲ ਬਾਸ ਲੇਤ ਫਿਰੈ ਕਾਹੂੰ ਏਕ ਪਦਮ ਕੈ ਸੰਪਟ ਸਮਾਤ ਹੈ ।
जैसे अल कमल कमल बास लेत फिरै काहूं एक पदम कै संपट समात है ।

जिस प्रकार भौंरा एक कमल के फूल से दूसरे कमल के फूल पर उछलता है, किन्तु सूर्यास्त के समय किसी भी फूल से रस चूसते समय वह उसकी पेटीनुमा पंखुड़ियों में ही कैद हो जाता है।

ਜੈਸੇ ਪੰਛੀ ਬਿਰਖ ਬਿਰਖ ਫਲ ਖਾਤ ਫਿਰੈ ਬਰਹਨੇ ਬਿਰਖ ਬੈਠੇ ਰਜਨੀ ਬਿਹਾਤ ਹੈ ।
जैसे पंछी बिरख बिरख फल खात फिरै बरहने बिरख बैठे रजनी बिहात है ।

जिस प्रकार एक पक्षी एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाकर सभी प्रकार के फल खाता है, परन्तु रात किसी भी पेड़ की शाखा पर बिता देता है,

ਜੈਸੇ ਤੌ ਬ੍ਯਾਪਾਰੀ ਹਾਟਿ ਹਾਟਿ ਕੈ ਦੇਖਤ ਫਿਰੈ ਬਿਰਲੈ ਕੀ ਹਾਟਿ ਬੈਠ ਬਨਜ ਲੇ ਜਾਤ ਹੈ ।
जैसे तौ ब्यापारी हाटि हाटि कै देखत फिरै बिरलै की हाटि बैठ बनज ले जात है ।

जिस प्रकार एक व्यापारी सभी दुकानों में वस्तुओं को देखता रहता है, किन्तु उनमें से किसी एक से ही माल खरीदता है,

ਤੈਸੇ ਹੀ ਗੁਰ ਸਬਦ ਰਤਨ ਖੋਜਤ ਖੋਜੀ ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਾਹੂ ਸੰਗ ਰੰਗ ਲਪਟਾਤ ਹੈ ।੫੮੯।
तैसे ही गुर सबद रतन खोजत खोजी कोटि मधे काहू संग रंग लपटात है ।५८९।

इसी प्रकार रत्नरूपी गुरु के वचनों का साधक रत्नरूपी खान अर्थात् सच्चे गुरु की खोज करता है। अनेक नकली गुरुओं में कोई विरला ही संत होता है जिसके श्रीचरणों में मोक्षसाधक अपना मन लगाता है। (वह सच्चे गुरु की खोज करता है, अमृत प्राप्त करता है।)