जिस प्रकार भौंरा एक कमल के फूल से दूसरे कमल के फूल पर उछलता है, किन्तु सूर्यास्त के समय किसी भी फूल से रस चूसते समय वह उसकी पेटीनुमा पंखुड़ियों में ही कैद हो जाता है।
जिस प्रकार एक पक्षी एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाकर सभी प्रकार के फल खाता है, परन्तु रात किसी भी पेड़ की शाखा पर बिता देता है,
जिस प्रकार एक व्यापारी सभी दुकानों में वस्तुओं को देखता रहता है, किन्तु उनमें से किसी एक से ही माल खरीदता है,
इसी प्रकार रत्नरूपी गुरु के वचनों का साधक रत्नरूपी खान अर्थात् सच्चे गुरु की खोज करता है। अनेक नकली गुरुओं में कोई विरला ही संत होता है जिसके श्रीचरणों में मोक्षसाधक अपना मन लगाता है। (वह सच्चे गुरु की खोज करता है, अमृत प्राप्त करता है।)