कबित सव्ये भाई गुरदास जी

पृष्ठ - 437


ਖਾਂਡ ਖਾਂਡ ਕਹੈ ਜਿਹਬਾ ਨ ਸ੍ਵਾਦੁ ਮੀਠੋ ਆਵੈ ਅਗਨਿ ਅਗਨਿ ਕਹੈ ਸੀਤ ਨ ਬਿਨਾਸ ਹੈ ।
खांड खांड कहै जिहबा न स्वादु मीठो आवै अगनि अगनि कहै सीत न बिनास है ।

कोई भी कार्य व्यर्थ नहीं जाता, सिवाय बार-बार बोले जाने वाले शब्दों के। बार-बार चीनी कहने से जीभ को मीठा स्वाद नहीं आता, न ही ठंड से कांपती हुई आग! आग! कहने से रुक सकती है।

ਬੈਦ ਬੈਦ ਕਹੈ ਰੋਗ ਮਿਟਤ ਨ ਕਾਹੂ ਕੋ ਦਰਬ ਦਰਬ ਕਹੈ ਕੋਊ ਦਰਬਹਿ ਨ ਬਿਲਾਸ ਹੈ ।
बैद बैद कहै रोग मिटत न काहू को दरब दरब कहै कोऊ दरबहि न बिलास है ।

डॉक्टर! डॉक्टर! कहने से कोई बीमारी ठीक नहीं होती और न ही पैसा! पैसा! कहने से पैसे से मिलने वाली सुख-सुविधाओं का आनंद लिया जा सकता है।

ਚੰਦਨ ਚੰਦਨ ਕਹਤ ਪ੍ਰਗਟੈ ਨ ਸੁਬਾਸੁ ਬਾਸੁ ਚੰਦ੍ਰ ਚੰਦ੍ਰ ਕਹੈ ਉਜੀਆਰੋ ਨ ਪ੍ਰਗਾਸ ਹੈ ।
चंदन चंदन कहत प्रगटै न सुबासु बासु चंद्र चंद्र कहै उजीआरो न प्रगास है ।

जैसे चंदन! चंदन कहने से चंदन की सुगंध नहीं फैल सकती, और न ही बार-बार चन्द्रमा! चन्द्रमा! कहने से चन्द्रमा की चमक का अनुभव हो सकता है जब तक कि चन्द्रमा उदय न हो जाए।

ਤੈਸੇ ਗਿਆਨ ਗੋਸਟਿ ਕਹਤ ਨ ਰਹਤ ਪਾਵੈ ਕਰਨੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਭਾਨ ਉਦਤਿ ਅਕਾਸ ਹੈ ।੪੩੭।
तैसे गिआन गोसटि कहत न रहत पावै करनी प्रधान भान उदति अकास है ।४३७।

इसी प्रकार, केवल प्रवचन सुनने से कोई भी व्यक्ति दिव्य जीवन-शैली और आचार-संहिता प्राप्त नहीं कर सकता। सबसे बुनियादी जरूरत है कि उन शिक्षाओं को वास्तविक जीवन में अपनाया जाए। इसलिए गुरु के आशीर्वादपूर्ण नाम सिमरन के अभ्यास से प्रकाश की प्राप्ति होती है।