जिस प्रकार समाज का कोई भी वर्ग, उच्च, मध्यम या निम्न वर्ग अपने पुत्र को बुरा या दुष्ट नहीं मानता,
जिस प्रकार सभी लोग लाभ कमाने के लिए व्यवसाय करते हैं, किन्तु वे सभी अपने-अपने पेशे को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और उसी से प्रेम करते हैं।
इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने आराध्य देव का आदर व प्रेम करता है तथा अपने जीवन काल में उनकी पूजा करने के लिए सदैव तत्पर व सचेत रहता है।
जिस प्रकार एक बेटा बड़ा होने पर व्यापार और व्यापार की कला को समझता है और उसमें निपुणता प्राप्त करता है, उसी प्रकार सच्चे गुरु से दीक्षा प्राप्त करने पर एक समर्पित शिष्य सीखता है कि सच्चे गुरु द्वारा आशीर्वादित ज्ञान, अमृत नाम मुक्ति में सक्षम है।