मन को ईश्वरीय शब्द में लीन करके, गुरु-चेतन साधक अपने भटकते मन को रोकने में सक्षम होता है। इससे उसकी स्मृति नाम के ध्यान में स्थिर हो जाती है और वह उच्च आध्यात्मिक अवस्था में पहुँच जाता है।
समुद्र और लहरें एक ही हैं। इसी तरह भगवान के साथ एकाकार होने से आध्यात्मिक तरंगों का अनुभव आश्चर्यजनक और शानदार रूप से अद्वितीय होता है। गुरु-चेतन लोग ही आध्यात्मिक अवस्था को समझने और अनुभव करने में सक्षम हैं।
गुरु-चेतन व्यक्ति गुरु के उपदेशों से नाम रूपी अमूल्य रत्न प्राप्त करता है और एक बार उसे प्राप्त करने के बाद वह नाम-सिमरन के अभ्यास में लीन रहता है।
गुरु और सिख (शिष्य) के सामंजस्यपूर्ण मिलन से सिख अपने मन को ईश्वरीय शब्द में लगाता है जिससे उसका आत्म परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है। इस प्रकार वह यह पहचानने में सक्षम हो जाता है कि वह वास्तव में क्या है। (61)