गुरु-उन्मुख व्यक्तियों का प्रेम-संबंध पत्थर पर खींची गई रेखा के समान होता है, जो अमिट होता है। अर्थात् गुरु-उन्मुख व्यक्तियों की संगति का महत्व यह है कि उसमें किसी प्रकार का द्वेष या वैर-भाव नहीं होता।
स्वार्थी व्यक्तियों का प्रेम पानी पर खींची गई लकीर के समान क्षणिक होता है, जबकि उनकी शत्रुता पत्थर पर खींची गई लकीर के समान बनी रहती है। वह उनके अंग का अंग बन जाती है।
गुरु-प्रधान व्यक्तियों का प्रेम लकड़ी के समान होता है, जो अपने अन्दर आग छिपाये रखता है, जबकि स्वेच्छाचारी व्यक्तियों का प्रेम इसके विपरीत होता है। गंगा नदी का शुद्ध जल मदिरा में मिल जाने पर प्रदूषित हो जाता है, किन्तु मदिरा नदी के जल में मिल जाने पर प्रदूषित हो जाता है।
नीच और मलिन मन वाला व्यक्ति साँप के समान होता है जो अपने बुरे गुणों के कारण पाप करता है। वह सदैव हानि पहुँचाने के लिए तत्पर रहता है। परन्तु गुरु-प्रधान व्यक्ति बकरी के समान होता है जो सदैव अच्छा कार्य करने के लिए तत्पर रहता है। (297)