जिस प्रकार मोर और बरसाती पक्षी आकाश में काले बादलों को देखकर और उनकी गड़गड़ाहट सुनकर मधुर ध्वनि करते हैं।
जिस प्रकार वसंत ऋतु में आम तथा अन्य अनेक वृक्षों पर फूल खिलते हैं, उस समय कोयल प्रसन्न होकर उन वृक्षों पर बैठकर बहुत मधुर ध्वनि निकालती है।
जैसे तालाब में कमल के फूल खिलते हैं और भौंरे आकर्षित होकर मधुर ध्वनि करते हुए उड़ते हुए आते हैं।
इसी प्रकार श्रोताओं को एकनिष्ठ भाव में बैठा देखकर गायकगण गहन भक्ति और ध्यानपूर्वक दिव्य स्तोत्रों का गायन करते हैं, जिससे प्रेममय शांति का वातावरण निर्मित होता है तथा गायक और श्रोता दोनों ही दिव्य आनंद की स्थिति में लीन हो जाते हैं। (५६७)