गुरु-चेतन व्यक्तियों की दृष्टि में सच्चे गुरु की छवि रहती है और सच्चे गुरु की आँखों में शिष्य की झलक रहती है। सद्गुरु के इस ध्यान के कारण ही ये शिष्य सांसारिक आकर्षणों से दूर रहते हैं।
वे गुरु के वचनों में लीन रहते हैं और उन वचनों की धुन उनकी चेतना में बसी रहती है। लेकिन शब्द और चेतना का ज्ञान उनकी पहुँच से परे है।
सच्चे गुरु की शिक्षाओं का पालन करने और भगवान के गुणों के चिंतन के अनुसार अपने चरित्र को ढालने से प्रेम की भावना विकसित होती है। गुरु के दर्शन की सुव्यवस्थित दिनचर्या, व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर देती है
संसार में जीवन जीते हुए गुरु-चेतन व्यक्ति हमेशा यही मानता है कि उसका जीवन जीवन के स्वामी-परमेश्वर का है। एक प्रभु में लीन रहना ही गुरु-चेतन व्यक्तियों की सुख-संपत्ति है। (45)