जो जीभ अमृतरूपी नाम का रसास्वादन नहीं करती, जो कान भगवान के नाम के सुमिरन की ध्वनि को नहीं सुनते, वे सब व्यर्थ और व्यर्थ हैं।
जो आंखें स्वयं का सच्चा दर्शन नहीं करतीं, तथा जो श्वास भगवान की सुगंध को नहीं सूंघतीं, वे भी अच्छे नहीं हैं।
जिन हाथों ने गुरु के पारस-पत्थर जैसे चरणों का स्पर्श नहीं किया, वे किसी काम के नहीं हैं। जिन पैरों ने गुरु के द्वार की ओर कदम नहीं बढ़ाए, वे भी किसी काम के नहीं हैं।
सच्चे गुरु के आज्ञाकारी सिखों का अंग-अंग पवित्र होता है। पवित्र लोगों की संगति की कृपा से उनका मन और दृष्टि सच्चे गुरु के नाम और दर्शन के ध्यान में केंद्रित रहती है। (199)