कबित सव्ये भाई गुरदास जी

पृष्ठ - 459


ਜੈਸੇ ਤਉ ਸਕਲ ਦ੍ਰੁਮ ਆਪਨੀ ਆਪਨੀ ਭਾਂਤਿ ਚੰਦਨ ਚੰਦਨ ਕਰੈ ਸਰਬ ਤਮਾਲ ਕਉ ।
जैसे तउ सकल द्रुम आपनी आपनी भांति चंदन चंदन करै सरब तमाल कउ ।

जिस प्रकार सभी वृक्ष अपनी प्रजाति के स्वभाव के अनुसार बढ़ते और फैलते हैं तथा वे अपना प्रभाव दूसरों पर नहीं डाल सकते, उसी प्रकार एक चंदन का वृक्ष अन्य सभी वृक्षों को अपनी सुगंध से सुवासित कर सकता है।

ਤਾਂਬਾ ਹੀ ਸੈ ਹੋਤ ਜੈਸੇ ਕੰਚਨ ਕਲੰਕੁ ਡਾਰੈ ਪਾਰਸ ਪਰਸੁ ਧਾਤੁ ਸਕਲ ਉਜਾਲ ਕਉ ।
तांबा ही सै होत जैसे कंचन कलंकु डारै पारस परसु धातु सकल उजाल कउ ।

जैसे तांबे में कुछ विशेष रसायन मिलाने से वह सोना बन सकता है, लेकिन पारस पत्थर के स्पर्श से सभी धातुएं सोना बन सकती हैं।

ਸਰਿਤਾ ਅਨੇਕ ਜੈਸੇ ਬਿਬਿਧਿ ਪ੍ਰਵਾਹ ਗਤਿ ਸੁਰਸਰੀ ਸੰਗਮ ਸਮ ਜਨਮ ਸੁਢਾਲ ਕਉ ।
सरिता अनेक जैसे बिबिधि प्रवाह गति सुरसरी संगम सम जनम सुढाल कउ ।

जिस प्रकार अनेक नदियों का प्रवाह अनेक प्रकार से भिन्न होता है, किन्तु गंगाजल में मिल जाने पर उनका जल शुद्ध एवं पवित्र हो जाता है।

ਤੈਸੇ ਹੀ ਸਕਲ ਦੇਵ ਟੇਵ ਸੈ ਟਰਤ ਨਾਹਿ ਸਤਿਗੁਰ ਅਸਰਨ ਸਰਨਿ ਅਕਾਲ ਕਉ ।੪੫੯।
तैसे ही सकल देव टेव सै टरत नाहि सतिगुर असरन सरनि अकाल कउ ।४५९।

इसी प्रकार कोई भी देवी-देवता अपना मूल स्वभाव नहीं बदलता (वे किसी को उसके स्वभाव के अनुसार पुरस्कृत कर सकते हैं) परन्तु चन्दन, पारस और गंगा की भाँति सद्गुरु सबको अपनी शरण में लेकर अमरी नाम से आशीर्वाद देते हैं।