कबित सव्ये भाई गुरदास जी

पृष्ठ - 313


ਅੰਤਰ ਅਛਿਤ ਹੀ ਦਿਸੰਤਰਿ ਗਵਨ ਕਰੈ ਪਾਛੈ ਪਰੇ ਪਹੁਚੈ ਨ ਪਾਇਕੁ ਜਉ ਧਾਵਈ ।
अंतर अछित ही दिसंतरि गवन करै पाछै परे पहुचै न पाइकु जउ धावई ।

शरीर में छिपे होने के बावजूद भी मन बहुत दूर तक पहुँचता है। अगर कोई उसका पीछा करने की कोशिश करे तो वह उस तक नहीं पहुँच सकता।

ਪਹੁਚੈ ਨ ਰਥੁ ਪਹੁਚੈ ਨ ਗਜਰਾਜੁ ਬਾਜੁ ਪਹੁਚੈ ਨ ਖਗ ਮ੍ਰਿਗ ਫਾਂਧਤ ਉਡਾਵਈ ।
पहुचै न रथु पहुचै न गजराजु बाजु पहुचै न खग म्रिग फांधत उडावई ।

कोई रथ, कोई तेज घोड़ा या ऐरावत (एक पौराणिक हाथी) भी उस तक नहीं पहुंच सकता। न तो कोई तेज उड़ने वाला पक्षी और न ही कोई सरपट दौड़ने वाला हिरण ही उसकी बराबरी कर सकता है।

ਪਹੁਚੈ ਨ ਪਵਨ ਗਵਨ ਤ੍ਰਿਭਵਨ ਪ੍ਰਤਿ ਅਰਧ ਉਰਧ ਅੰਤਰੀਛ ਹੁਇ ਨ ਪਾਵਈ ।
पहुचै न पवन गवन त्रिभवन प्रति अरध उरध अंतरीछ हुइ न पावई ।

तीनों लोकों में व्याप्त वायु भी उस तक नहीं पहुंच सकती। जो पारलौकिक भूमि तक पहुंचने में समर्थ है, वह मन की दौड़ नहीं जीत सकता।

ਪੰਚ ਦੂਤ ਭੂਤ ਲਗਿ ਅਧਮੁ ਅਸਾਧੁ ਮਨੁ ਗਹੇ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਸਾਧਸੰਗਿ ਬਸਿ ਆਵਈ ।੩੧੩।
पंच दूत भूत लगि अधमु असाधु मनु गहे गुर गिआन साधसंगि बसि आवई ।३१३।

माया के पांच विकारों से ग्रस्त, जिसने इसे राक्षस की तरह जकड़ रखा है, इस तुच्छ और असंशोधित मन को केवल तभी नियंत्रित और अनुशासित किया जा सकता है, जब यह भगवान के संत और सच्चे भक्तों के दयालु आशीर्वाद के माध्यम से सच्चे गुरु की दीक्षा स्वीकार कर ले।