सच्चे गुरु का आज्ञाकारी शिष्य गुरु की शिक्षा और ज्ञान के सहारे को ही प्रामाणिक और सच्चा मानता है। उसके हृदय में एक ईश्वर के अलावा कोई दूसरा नहीं है। वह भगवान शिव या देवी शक्ति को मुक्ति का साधन नहीं मानता। वह एक माध्यम ही रहता है।
वह माया के प्रभाव से अछूता रहता है। हार हो या जीत, सुख हो या दुख उसे विचलित या प्रसन्न नहीं कर पाते। वह सफलता और असफलता के सभी विचारों को त्यागकर परम आध्यात्मिक अवस्था में लीन रहता है।
सच्ची संगति में शामिल होकर वह ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर एक ईश्वर का भक्त बन जाता है। पांच तत्वों के मोह से विमुख होकर वह उस अद्भुत ईश्वर का नाम सिमरन करने लगता है और उस पर अपनी आस्था बनाए रखता है।
गुरसिख छह दार्शनिक विचारधाराओं के आवरण से परे सच्चे साधकों की संगति में रहता है। वह शरीर के नौ द्वारों के बंधनों से मुक्त होकर दसवें द्वार (दशम द्वार) में आनंदपूर्वक रहता है। (333)