कबित सव्ये भाई गुरदास जी

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ਚਤੁਰ ਬਰਨ ਮਿਲਿ ਸੁਰੰਗ ਤੰਬੇਲ ਰਸ ਗੁਰਸਿਖ ਸਾਧਸੰਗ ਰੰਗ ਮੈ ਰੰਗੀਲੇ ਹੈ ।
चतुर बरन मिलि सुरंग तंबेल रस गुरसिख साधसंग रंग मै रंगीले है ।

जिस प्रकार पान का पत्ता, सुपारी, नींबू और कत्था के मिलने से गहरा लाल रंग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार सत्गुरु की हजूरी में रहने वाले सिख सच्चे और महान सिखों की संगति में उनके प्रेम और नाम के रंग में रंग जाते हैं।

ਖਾਂਡ ਘ੍ਰਿਤ ਚੂਨ ਜਲ ਮਿਲੇ ਬਿੰਜਨਾਦਿ ਸ੍ਵਾਦ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਮੈ ਰਸਿਕ ਰਸੀਲੇ ਹੈ ।
खांड घ्रित चून जल मिले बिंजनादि स्वाद प्रेम रस अंम्रित मै रसिक रसीले है ।

जैसे चीनी, घी, आटा और पानी को मिलाकर अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं, उसी प्रकार गुरु-चेतन व्यक्ति भी उन पवित्र और श्रेष्ठ पुरुषों की संगति में नाम रूपी अमृत के रसास्वादक बन जाते हैं, जो स्वयं भी भगवान के भजन में लीन रहते हैं।

ਸਕਲ ਸੁਗੰਧ ਸਨਬੰਧ ਅਰਗਜਾ ਹੋਇ ਸਬਦ ਸੁਰਤਿ ਲਿਵ ਬਾਸਨਾ ਬਸੀਲੇ ਹੈ ।
सकल सुगंध सनबंध अरगजा होइ सबद सुरति लिव बासना बसीले है ।

जिस प्रकार सभी सुगंधों को एक साथ मिलाने पर उच्च गुणवत्ता वाला इत्र बनता है, उसी प्रकार गुरु के सेवक सिख नाम सिमरन के कारण तथा गुरु के वचनों को अपने मन में बसा लेने के कारण सुखद सुगंध वाले बन जाते हैं।

ਪਾਰਸ ਪਰਸਿ ਜੈਸੇ ਕਨਿਕ ਅਨਿਕ ਧਾਤੁ ਦਿਬਿ ਦੇਹ ਮਨ ਉਨਮਨ ਉਨਮੀਲੇ ਹੈ ।੯੪।
पारस परसि जैसे कनिक अनिक धातु दिबि देह मन उनमन उनमीले है ।९४।

जैसे पारस के स्पर्श से अनेक धातुएँ सोने में बदल जाती हैं, वैसे ही सच्चे गुरु की संगति में श्रद्धालु सिख भी तेजस्वी और पुष्पित हो जाते हैं। (94)