जैसे बोया गया बीज वृक्ष बन जाता है और समय के साथ उसका विस्तार होता है, वैसे ही सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वशक्तिमान ईश्वर के एक दिव्य रूप से एक सच्चा गुरु प्रकट होता है।
जिस प्रकार एक वृक्ष असंख्य फल उत्पन्न करता है, उसी प्रकार सच्चे गुरु के अनेक शिष्यों (गुरसिखों) का समूह भी असंख्य फल उत्पन्न करता है।
सच्चे गुरु के पवित्र स्वरूप पर मन को केन्द्रित करना, जो भगवान की अन्तर्निहित अभिव्यक्ति है, शब्द के रूप में उनकी अनुभूतियाँ, उनका चिंतन और भगवान के पारलौकिक रूप को समझना ही वास्तव में अन्तर्निहित भगवान का चिंतन है।
नियत स्थान पर पवित्र मण्डली में एकत्रित होकर, पूर्ण एकाग्रता तथा प्रेमपूर्वक भगवान के नाम का ध्यान करने से मनुष्य संसार सागर से तर सकता है। (५५)