अनेक रंग-बिरंगे उत्सवों को आँखों से देखकर भी अज्ञानी व्यक्ति सच्चे गुरु के दर्शन की महिमा को नहीं समझ पाया। उसने हर समय प्रशंसा और निन्दा सुनकर नाम सिमरन का महत्व भी नहीं सीखा।
दिन-रात सांसारिक वस्तुओं और लोगों की प्रशंसा करते हुए, वह गुणों के सागर - सच्चे गुरु तक नहीं पहुँच पाया। उसने अपना समय व्यर्थ की बातों और हंसी-मजाक में बर्बाद कर दिया, लेकिन सच्चे भगवान के अद्भुत प्रेम को नहीं पहचान पाया।
माया के लिए रोते-बिलखते हुए उन्होंने अपना जीवन व्यतीत कर दिया, लेकिन कभी सच्चे गुरु के वियोग का दुख महसूस नहीं किया। मन सांसारिक मामलों में उलझा रहा, लेकिन सच्चे गुरु की शरण न लेना ही मूर्खता थी।
वेद-शास्त्रों की तुच्छ बकवास और कर्मकाण्डी ज्ञान में लिप्त होकर मूर्ख प्राणी सच्चे गुरु के परम ज्ञान को नहीं जान सकता। ऐसे व्यक्ति का जन्म और जीवन निंदा के योग्य है जो उसने धर्मभ्रष्ट होकर बिताया है।