मेरे प्रियतम का वियोग न केवल मेरे शरीर में जंगल की आग की तरह प्रकट हो रहा है, बल्कि ये सभी स्वादिष्ट व्यंजन और वस्त्र मुझे सुख देने के स्थान पर आग की तीव्रता बढ़ाने में तेल की तरह काम कर रहे हैं और फलस्वरूप मेरी पीड़ा को बढ़ा रहे हैं।
पहले तो यह वियोग, अपने साथ जुड़ी आहों के कारण धुएं जैसा प्रतीत हो रहा है, जो असहनीय है, और फिर यह धुआं आकाश में काले बादलों जैसा प्रतीत हो रहा है, जिससे चारों ओर अंधकार छा रहा है।
आसमान में चाँद भी ज्वाला की तरह दिख रहा है। तारे भी मुझे उस आग की चिंगारियाँ लग रहे हैं।
मरणासन्न रोगी की भाँति विरह की अग्नि से उत्पन्न हुई यह दशा किससे कहूँ? ये सब वस्तुएँ (चन्द्रमा, तारे, वस्त्र आदि) मेरे लिए कष्टकारक तथा दुःखदायक हो रही हैं, जबकि ये सब परम शान्तिदायक तथा कटु हैं॥