गुरु के आज्ञाकारी दास नाम-सिमरन के रंग में रंगकर (मन, वाणी और कर्म को एकरूप रखकर) उस अद्भुत और दिव्य प्रभु परमात्मा को प्रत्यक्ष देखते हैं।
और जब वह भीतर की ओर देखता है (अपनी शक्तियों को भीतर एकाग्र करता है) तो उसे अपने भीतर दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। वह अपनी चेतना में तीनों लोकों की घटनाओं को देखता है।
गुरु-ज्ञान की परम निधि जब गुरु-चेतना प्राप्त व्यक्ति के मन में प्रकाशित हो जाती है, तो उसे तीनों लोकों का ज्ञान हो जाता है। और तब भी वह स्वयं को उस विराट् में लीन करने के अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होता।
ऐसा भक्त परमानंद की दिव्य अमृत का गहन पान करते हुए समाधि की अवस्था में रहता है। यह अद्भुत अवस्था वर्णन से परे है। इस अवस्था को देखकर व्यक्ति आश्चर्यचकित हो जाता है। (64)