आसा, प्रथम मेहल:
गुरु से सच्ची शिक्षा प्राप्त करने पर तर्क समाप्त हो जाते हैं।
लेकिन अत्यधिक चतुराई के कारण व्यक्ति पर केवल गंदगी ही चढ़ती है।
भगवान के सच्चे नाम से आसक्ति का मैल दूर हो जाता है।
गुरु की कृपा से मनुष्य भगवान से प्रेमपूर्वक जुड़ा रहता है। ||१||
वह तो सदैव विद्यमान है; अपनी प्रार्थनाएँ उसी को अर्पित करो।
दुःख और सुख ईश्वर के हाथ में हैं, जो सच्चे रचयिता हैं। ||१||विराम||
जो मिथ्या आचरण करता है, वह आता है और चला जाता है।
बोलने और बात करने से उसकी सीमाओं का पता नहीं लगाया जा सकता।
जो कुछ भी दिखता है, वह समझ में नहीं आता।
नाम के बिना मन में संतोष नहीं आता ||२||
जो भी पैदा होता है वह रोग से ग्रस्त होता है,
अहंकार और माया की पीड़ा से पीड़ित।
केवल वे ही बचाये जाते हैं, जिनकी रक्षा परमेश्वर करता है।
सच्चे गुरु की सेवा करते हुए वे अमृत का पान करते हैं। ||३||
इस अमृत को चखने से अस्थिर मन वश में हो जाता है।
सच्चे गुरु की सेवा करने से मनुष्य को शब्द का अमृत मिलता है।
सत्य शब्द के माध्यम से मोक्ष की स्थिति प्राप्त होती है।
हे नानक, अहंकार भीतर से मिट जाता है। ||४||१३||
राग आसा संपूर्ण धुनों वाला पंजाब का एक लोकप्रिय लोक राग है। यह मध्यम (मा) वादी और शरज (सा) संवादी के साथ बिलावल विचार राग है। आरोही में गांधार और निषध स्वर वर्जित हैं। इस कारण इसकी जाति अपूर्ण मानी जाती है, अर्थात सप्तक के पांच स्वरों का प्रयोग आरोही क्रम में तथा सात स्वरों का प्रयोग अवरोही क्रम में किया जाता है। इस राग को गाने का समय प्रातः और सायं संधि प्रकाश का समय है।